यहहोना चाहिए
{राजनीितकनियुक्ति वाले वकीलों की जिम्मेदारी तय हो। नियुक्ति प्रक्रिया भी पारदर्शी होनी चाहिए।
{छह माह में परफॉरमेंस रिपोर्ट ली जानी चाहिए।
आंकड़े पिछले विधानसभा सत्र में गृहमंत्री गुलाबचंद कटारिया द्वारा दी गई जानकारी के अनुसार।
इसलिए जीत | मजबूत मॉनिटरिंग
मॉनिटरिंगसिस्टम बना हुआ है। सरकार की तरफ से मजबूती से पक्ष रखते हैं, क्योंकि यह इनकी कॅरिअर ग्रोथ से जुड़ा हुआ है। हर पांच साल में बदलते नहीं हैं।
हार इसलिए | जवाबदेही नहीं
स्पष्टजिम्मेदारी नहीं। कोई मॉनिटरिंग सिस्टम भी नहीं। सरकार को यह तक पता नहीं है कि कितने मामलों में ये वकील पैरवी कर रहे हैं और इनका ओवरऑल रिजल्ट कितना हैं।
परीक्षा पास कर बने 664 सरकारी वकील
{ये664 सरकारी वकील आरपीएससी से चयनित।
{इनमें 240 अभियोजन अधिकारी 424 सहायक अभियोजन अधिकारी हैं।
{सालानावेतन कुल 60 करोड़, अन्य सुविधाएं।
{मजिस्ट्रेटकोर्ट्स में सरकारी मामलों की पैरवी करते हैं।
सिफारिश पर नियुक्त 370 वकील
{कलेक्टरजिला जज की सिफारिश पर नियुक्ति होती है।
{370 में से 27 सुप्रीम कोर्ट, 90 हाईकोर्ट 217 अधीनस्थ कोर्ट में केस देख रहे हैं।
{सालानावेतन कुल 40 करोड़ रु., सुविधाएं अलग।
{सेशनऊपरी कोर्ट में सरकार की पैरवी करते हैं।
...लेकिन तस्वीर यह भी
जोभर्ती परीक्षा पास कर वकील बने वे सरकार को दिला रहे 90 फीसदी मामलों में जीत
मनोजशर्मा | जयपुर
अदालतोंमें लाखों केस पेंडिंग हैं। हर सरकार अपने कार्यकाल में खुद के मामलों की पैरवी के लिए करीब पौने चार साै वकीलों को मानदेय पर पब्लिक प्रोसिक्यूटर (पीपी), एडिशनल पब्लिक प्रोसिक्यूटर (एपीपी) और स्पेशल पब्लिक प्रोसिक्यूटर नियुक्त करती है। ये वो वकील होते हैं जो हर पांच साल में बदल जाते हैं। यानी सरकारों के साथ चलने वाले। राजनीतिक तौर पर हुई इन नियुक्तिओं पर सालाना 40 करोड़ रुपए से ज्यादा खर्च होता है, जबकि सरकारी वकीलों की तुलना में ये वकील सिर्फ 10 फीसदी केसों में सरकार को जीत दिला पाते हैं। वजह साफ है- राजनीतिक तौर पर नियुक्त वकीलों की जिम्मेदारी तय नहीं होती। इनकी तुलना में सरकारी वकील 90 फीसदी केसों में जीत दिलवा रहे हैं। विशेषज्ञ खुद मानते हैं-भले ही नियुक्तियां राजनीतिक हों, लेकिन इनकी जिम्मेदारी तय करनी चाहिए। सरकार ऐसी नियुक्तियों पर एक कार्यकाल में 200 करोड़ रु. तक खर्च करती है।
पढ़िएभास्कर की स्पेशल रिपोर्ट...
92%
से ज्यादा केसों में जीत
10%
से भी कम केसों में जीत
जस्टिस वी एस दवे, रिटायर्ड जज, राजस्थान हाईकोर्ट
जबपॉलिटिकल एप्रोच से नियुक्तियां होती है तो वे लाेग भी कामयाब हो जाते हैं जिन्हें सामान्य तौर पर एक-दो मुकदमे भी नहीं मिलते। यदि वास्तव में सरकार सजा का प्रतिशत बढ़ाना चाहती है तो सिस्टम डवलप करना होगा।
अच्छे वकील नियुक्त करने होंगे। इसके लिए अच्छे पैसे भी खर्च करने होंगे। तभी नतीजे अच्छे मिलेंगे।
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